इलाज

पेट दर्द का आयुर्वेदिक उपचार

पेट के दर्द को आयुर्वेद में उदर शूल के नाम से जाना जाता है। यह कई प्रकार के उदर रोगों पेट की बीमारियों के कारण हो सकता है। आमतौर पर लंबे समय तक पाचन शक्ति की खराबी और अपच के कारण पेट में गड़बड़ी हो जाती है जो लोगों में पेट दर्द का कारण बन सकती है। आयुर्वेद में पेट के दर्द को दूर करने के लिए कई सारे प्रभावी उपाय हैं। इन प्रक्रियाओं में तप (फोमाटेशन), वामन (मेडिकल इमिशन) और विरेचन (शुद्धि) शामिल हैं। आयुर्वेद पद्धति में कई सारे ऐसी दवाएं और जड़ी बूटियां दी जाती हैं जो पेट के दर्द को दूर करने में मदद करर सकती हैं।  तिल, मदाना (इमेटिक नट), अग्नि-प्रभा रस, मंडुरा लौहा, क्षार वाटी, प्रलयनाल रस, अग्निमुखा रस और गगनसूर्यादि रस ऐसी ही प्रमुख दवाएं हैं जो उदर रोग को ठीक करने में प्रभावी हो सकती हैं।

आयुर्वेद की दृष्टि से पेट दर्द

पेट दर्द का प्रमुख कारण गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रोग होता है जो लिवर, आंतों या पेट के अन्य अंगों को प्रभावित करता है। आयुर्वेद के अनुसार पेट दर्द आठ प्रकार का होता है। ये सभी प्रकार दोष के आधार पर भिन्न होते हैं। पेट में दर्द निम्न कारणों से हो सकता है।

  • वात दोष।
  • पित्त दोष।
  • कफ दोष।
  • वात और पित्त दोनों तरह के दोष का संयोजन।
  • वात और कफ के दोषों का संयोजन।
  • पित्त और कफ के दोषों का संयोजन।
  • उपरोक्त तीनों दोषों का संयोजन।
  • विषाक्त दोष अथवा खाद्य पदार्थों का सही से पाचन न हो पाना।

भोजन के पाचन के दौरान होने वाले पेट दर्द को परिनमा शूल कहा जाता है। कई अन्य बीमारियों से भी पेट में दर्द हो सकता है जैसे ग्रहनी रोग आदि।

आयुर्वेदिक दवाइयां

अग्निप्रभा रस

अग्नि-प्रभा रस में पारा, गंधक, एकोनाइट, सीप के गोले, हंसपदी और अदरक होता है। यह रस पाउडर के रूप में होता है, जिसे शहद के साथ सेवन किया जाता है। यह पाचन में सुधार करने के साथ और सभी प्रकार के बुखार, सूजन, एनीमिया, कफ के कारण होने वाले रोग, पेट के रोगों और दर्द के इलाज में फायदेमंद होता है।

क्षार वाटी

क्षार वटी में एकोनाइट, अभ्रक, शंख, इमली, तांबा, त्रिकटु, तुलसी (पवित्र तुलसी), भृंगराज (भांगड़ा), अदरक और मटुंगा (जंगली नींबू) का संयोजन होता है। इसका सेवन आमतौर पर शहद के साथ किया जाता है। इस दवा का उपयोग बवासीर, और पाचन से संबंधित कई रोगों के इलाज में किया जाता है। यह पेट दर्द, ग्रैनी और गुलमा के कारण होने वाले दर्द के इलाज में भी प्रभावी है।

अग्निमुख रस

अग्निमुख रस में एकोनाइट, त्रिफला, कुफिलु, वासा (मालाबार अखरोट), हरितकी, धतूरा और सुपारी जैसे विभिन्न तत्वों का संयोजन होता है। यह वात दोष के कारण शरीर में होने वाल किसी भी प्रकार के दर्द को ठीक करने में उपयोगी है।

गगनसूर्यदि रस

गगनसुरादि रस विदंगा (काली मिर्च), त्रिफला, चित्रक, त्रिकटु और कई अन्य सामग्रियों से तैयार किया जाता है। इसका सेवन आम तौर पर शहद के साथ किया जाता है। हृदय और छाती के किनारों में होने वाले दर्द के इलाज में इसका उपयोग होता है। इसके अलावा गठिया, सिर दर्द, लिवर बढ़ने के कारण पेट दर्द में भी इसका उपयोग फायदेमंद होता है। अस्थमा, खांसी, कुष्ठ, हैजा जैसे रोगों को ठीक करने में भी इसका प्रयोग किया जाता है।

आहार और जीवन शैली में परिवर्तन

क्या करें

  • अपने आहार में जौ और गर्म दूध शामिल करें।
  • आहार में शाली के चावल को शामिल करें जो तीन साल से अधिक पुराना न हो।
  • जंगली जानवरों से तैयार सूप को आहार में शामिल करें।
  • फल और सब्जियां जैसे कि पटोला (एक प्रकार की लौकी), बैंगन, मीठे और पके आम, पीपल के फल, खट्टे फल, अंगूर और कपीठा का सेवन करें।
  • आहार में नींबू का रस, सूखे अदरक, लहसुन, लौंग, वीरा नमक और हींग को शामिल करें।

क्या करें

  • भोजन में बहुत ज्यादा अंतराल न हो, न ही अनियमित मात्रा में भोजन करें।
  • पेशाब, शौच आदि जैसी प्राकृतिक क्रियाओं को ज्यादा देर तक रोकें नहीं।
  • ठंडी, कड़वी और कसैले खाद्य पदार्थों का सेवन न करें।
  • बहुत हैवी भोजन करने से बचें।
  • शराब पीने और अधिक मात्रा में नमक खाने से बचें।
  • बहुत ज्यादा शारीरिक व्यायाम और संभोग न करें।
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